
एक दिन मै रश्ते से गुजर रहा था तभी मैंने देखा की एक बूढी औरत सामने से आ रही थी और उसके सिर पर थी एक लकडियो की भरी गठरी। उस औरत को देखने से लगता था की वह गठरी का बोझ उठाने में असमर्थ है लेकिन फिर भी वह उसका बोझ उठा रही थी। लेकिन जब वह औरत मेरे पास से गुजारी तो मैंने उसे रोककर उसकी गठरी यह कहते हुए ले ली की माताजी इस गठरी का बोझ उठाने में आप की असमर्थता मुझसे देखि नहीं जा रही है और इसी कारण वश यह गठरी मै उठा रहा हु और आपके घर तक इसे मै छोड़ दूंगा। और इस तरह से मैंने वो गठरी उसके घर तक उसके साथ साथ चलकरपहुंचा दी। इसके बाद कुछ लोग जो मेरी इस हरकत को देख रहे थे उन्होंने मुझसे पूछा की मैंने उस औरत की सहायता क्यों की जबकि मै तो उसे जानता तक नहीं। इसके बाद मैंने उन महाशय से बड़े प्रेम से कहा की बंधू, आज हमारी यही कमी अत्याचारों को जन्म दे रही है क्योकि जो आपराधिक तत्व होते है वे सिर्फ यही समझकर की किसी से गलत व्यवहार करने पर और कोई तो बोलेगा नहीं सो जैसा चाहे वैसा करलो। वो औरत मुसीबत में थी पर इसी कारन की कहने पर भी कोई सहायता तो करेगा नहीं सो उसने किसी को नहीं कहा पर में उसकी सहायता की पुकार उसकी आँखों में ही समझ गया सो मैंने उसकी मदद कर दी। और इस प्रकार मदद करना कोई गलत काम थोड़े ही है। हम भारतीय तो सारे संसार को अपना परिवार मानते है तो इस प्रकार वह बूढी अम्मा भी इसी परिवार की सदस्य हुई । इस प्रकार उन बंधू का यह प्रश्न की ये रिश्ता क्या कहलाता है? दूर हुआ। और इस प्रकार के इंसानियत के कार्य हमें जिन्दगी में नीचा नहीं बनाते है। कई मेरे पढ़े लिखे साथी सोचते होंगे की जब वो कोलेज में होते है और यदि उस समय उन्हें कोई परोपकार का कार्य करने का मौका मिलाता है तो वे नहीं कर सकते क्योकि एसा करने से अन्य साथी उनकी मजाक बना लेते है या लड़कियों के बीच उनकी इमेज खराब हो जायेगी तो मै उनको बता देना चाहूँगा की उन्हें वे परोपकार के कार्य बेझिझक करने चाहिए। आपके मित्रो के बीच आपकी इमाज और अच्छी हो जाएगी। और आपका रिश्ता वास्तव में एक सही व्यक्तित्व के रूप में लोगो से जुड़ जाएगा।
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